आ रही हिमालय से पुकारहै उदधि गरजता बार बारप्राची पश्चिम भू नभ अपार;सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्तवीरों का हो कैसा वसन्तफूली सरसों ने दिया रंगमधु लेकर आ पहुंचा अनंगवधु वसुधा पुलकित अंग अंग;है वीर देश में किन्तु कंतवीरों का हो कैसा वसन्तभर रही कोकिला इधर तानमारू बाजे पर उधर गानहै रंग और रण का विधान;मिलने को आए आदि अंतवीरों का हो कैसा वसन्तगलबाहें हों या कृपाणचलचितवन हो या धनुषबाणहो रसविलास या दलितत्राण;अब यही समस्या है दुरंतवीरों का हो कैसा वसन्तकह दे अतीत अब मौन त्यागलंके तुझमें क्यों लगी आगऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;बतला अपने अनुभव अनंतवीरों का हो कैसा वसन्तहल्दीघाटी के शिला खण्डऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंडराणा ताना का कर घमंड;दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंतवीरों का हो कैसा वसन्तभूषण अथवा कवि चंद नहींबिजली भर दे वह छन्द नहींहै कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;फिर हमें बताए कौन हन्तवीरों का हो कैसा वसन्त
रचनाकार: सुभद्राकुमारी चौहान
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