Friday, November 19, 2010

प्रतिष्ठा पाने की ‘गुजारिश’


फिल्म: गुजारिश
कलाकार: रितिक रोशन, ऐश्वर्या राय बच्चन, शेरनाज पटेल, आदित्य रॉय कपूर, रजित कपूर, नफीसा अली, सुहेल सेठ, मोनिकांगना दत्ता
रेटिंग: ***1/2
डायरेक्टर: संजय लीला भंसाली
प्रोडच्यूसर: एसएलबी फिल्म्स, यूटीवी मोशन पिक्चर्स
म्यूजिक डायरेक्टर: संजय लीला भंसाली

विवादों के साथ ही फिल्म गुजारिश से एक बार फिर संजय लीला भंसाली लोगों के सामने आए हैं। उनकी पिछली फिल्म सांवरिया के पिटने के बाद वे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए काफी बेताब हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि कई पुरस्कार जीत चुकी भंसाली की ब्लैक की तरह यह फिल्म भी क्या वैसा ही इतिहास दोहरा पाएगी। या एक बार फिर यह फिल्म भी सांवरिया की तरह पिट जाएगी। भंसाली इस फिल्म से साबित करना चाहेंगे कि वे अभी चूके नहीं हैं। फिल्म ब्लैक में उन्होंने जिस तरह से रानी मुखर्जी व अमिताभ बच्चन से किरदार को जीवंत करवा दिया था, ठीक उसी तरह की रितिक व ऐश्वर्या राय बच्चन से उन्होंने किरदारों को बिल्कुल दर्शकों से रूबरू करवाया है।

फिल्म में इच्छामृत्यु को लेकर सवाल उठाए गए हैं। भारत में भी इच्छामृत्यु की याचिकाएं दायर की गईं जिनमें कई को खारिज कर दिया गया है अथवा मामले अदालत में लंबित हैं। इस फिल्म के द्वारा इस विषय को उठाए जाने पर एक बार फिर से मुद्दा चर्चाओं में आ सकता है। बहरहाल फिल्म की कहानी है एक मशहूर जादूगर इथेन मस्करहंस (रितिक रोशन) की। जिसे एक शो के दौरान हुए हादसे में चोट लग जाती है और वह पैराप्लेजिया का शिकार हो जाता है। उसकी देखभाल सोफिया (ऐश्वर्या राय बच्चन) करती है। पूरी फिल्म इच्छामृत्यु के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। और अंतत: जीत जिंदगी को खुलकर जीने वाले की ही होती है।

नफीसा अली ने इथेन की मां को परदे पर जीया है तो वहीं सुहेल सेठ ने डॉक्टर के किरदार में खूब रंग जमाया है। एक वकील व दोस्त के रूप में शेरनाज पटेल ने काफी अच्छा अभिनय किया है। सरकारी वकील की भूमिका में रजित कपूर ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। वहीं इस फिल्म के जरिए मोनिकांगना दत्ता व फिल्म एक्शन रिप्ले से बॉलीवुड में प्रवेश करने वाले आदित्य रॉय कपूर ने भी ठीक-ठाक अभिनय किया है।

फिल्म में गीत-संगीत को फिल्म के मूड के हिसाब से ही रचा गया है। वैसे इसके कई गाने पहले ही लोगों के होंठों पर आ गए हैं। फिल्म की खास बात यह है कि संगीत संजय लीला भंसाली ने खुद ही दी है। इसके तकनीकी पक्ष के बारे में बात न की जाए तो इस फिल्म के तकनिशियनों के साथ नाइंसाफी होगी। इसकी एडिटिंग काफी जबरदस्त है और पूरी फिल्म के दौरान यह दर्शकों को बांधे रखती है। फिल्म का कैमरा वर्क देखकर लगता है जैसे कैनवास पर एक चित्र उकेरा गया है।

समीक्षक: मनीष कुमार

Sunday, August 29, 2010

भावनाओं के समंदर में गोते लगाती आशाएं


कलाकार : जॉन अब्राहम, सोनल सहगल, श्रेयस तलपड़े, अनायता नायर, प्रतीक्षा लोंकर, गिरीश कर्नाड, फरीदा जलाल
म्यूजिक : मोहित चौहान, प्रीतम, शिराज उप्पल
डायरेक्टर : नागेश कुकुनूर
प्रोड्यूसर : परसेप्ट पिक्चर लिमिटेड।

जिंदगी को जुआ समझने वाले किसी इंसान को जब यह पता चले कि उसके पास अब बहुत कम समय बचा है, तब उसे कैसा लगता होगा। इसे ही नागेश ने अपनी फिल्म के माध्यम से दिखाने की कोशिश की है। फिल्म में काम कर रहे कलाकारों ने इंसानी जज्बातों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया है।

आशाएं का सार यह है कि राहुल सिंह(जॉन अब्राहम) जिंदगी को जुआ समझता है और उसकी प्रेमिका नफीसा (सोनल सहगल) उसे समझाती है कि यह सही नहीं है लेकिन वह नहीं मानता और अपनी व प्रेमिका की पूरी जिंदगी की जमा पूंजी को दांव पर लगा देता है। उसका यह दांव चल भी जाता है और एक ही झटके में वह तीन करोड़ का मालिक बन जाता है।
फिल्म में ट्विस्ट तब आता है जब सगाई की पार्टी के दौरान राहुल बेहोश हो जाता है और पता चलता है कि उसे लंग कैंसर है। कैंसर से पीड़ित होने के बाद राहुल निराश होकर घर छोड़कर एक ऐसी जगह पहुंचता है, जहां विभिन्न असाध्य रोगों से ग्रसित लोग मौत का इंतजार कर रहे हैं। यहां आने के बाद राहुल की जिंदगी ही बदल जाती है और इसके आगे की कहानी जानने के लिए आप पूरी फिल्म देख सकते हैं।

यह फिल्म भी काफी पहले ही बन गई थी लेकिन निर्माता व वितरक कंपनी के बीच मतभेद के कारण इसका प्रदर्शन टलता रहा। इस फि ल्म का अगर किसी को इंतजार था तो वे नाम थे अनायता नायर व सोनल सहगल। आपको अगर ध्यान हो तो अनायता को आपने शाहरूख खान की फिल्म चक दे इंडिया में देखा होगा। वैसे एक खास बात यह भी है कि आशाएं उनकी पहली फिल्म थी लेकिन कुछ कारणों से यह उनकी दूसरी फिल्म बन गई। फिल्म का तकनीकी पक्ष मजबूत है।

अगर अभिनय की बात की जाए तो जॉन ने अपने भावहीन अभिनेता होने के ठप्पे से निकलने की पूरी कोशिश की है। वहीं फिल्म में पद्मा का किरदार निभाने वाली अनायता नायर ने दमदार अभिनय किया है। जॉन व अनायता के बीच की केमिस्ट्री भी रंग जमाने में कामयाब रही है। वहीं सोनल सहगल पूरी तरह से शो-पीस बनकर रह गईं हैं। हां, गिरीश कर्नाड व फरीदा जलाल ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है। फिल्म में एक गंभीर विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाया गया है।

सिस्टर ग्रेस के किरदार में प्रतीक्षा लोंकर का अभिनय भी औसत रहा है। श्रेयस ने नागेश का सम्मान करते हुए इस फिल्म में अतिथि कलाकार की भूमिका स्वीकार कर ली है लेकिन उनके खाते में करने के लिए कुछ भी नहीं था। फिल्म में कई खूबसूरत दृश्य हैं जिसके लिए कैमरामैन को इसका श्रेय देना चाहिए।

- मनीष कुमार

Saturday, February 27, 2010

झांसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई। निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बूझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात? जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'। यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार, यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार, घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रचनाकार: सुभद्राकुमारी चौहान

वीरों का हो कैसा वसन्त

आ रही हिमालय से पुकारहै उदधि गरजता बार बारप्राची पश्चिम भू नभ अपार;सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्तवीरों का हो कैसा वसन्तफूली सरसों ने दिया रंगमधु लेकर आ पहुंचा अनंगवधु वसुधा पुलकित अंग अंग;है वीर देश में किन्तु कंतवीरों का हो कैसा वसन्तभर रही कोकिला इधर तानमारू बाजे पर उधर गानहै रंग और रण का विधान;मिलने को आए आदि अंतवीरों का हो कैसा वसन्तगलबाहें हों या कृपाणचलचितवन हो या धनुषबाणहो रसविलास या दलितत्राण;अब यही समस्या है दुरंतवीरों का हो कैसा वसन्तकह दे अतीत अब मौन त्यागलंके तुझमें क्यों लगी आगऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;बतला अपने अनुभव अनंतवीरों का हो कैसा वसन्तहल्दीघाटी के शिला खण्डऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंडराणा ताना का कर घमंड;दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंतवीरों का हो कैसा वसन्तभूषण अथवा कवि चंद नहींबिजली भर दे वह छन्द नहींहै कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;फिर हमें बताए कौन हन्तवीरों का हो कैसा वसन्त
रचनाकार: सुभद्राकुमारी चौहान

तीन दोस्त

हम तीन बीजउगने के लिए पड़े हैं हर चौराहे परजाने कब वर्षा हो कब अंकुर फूट पड़े,हम तीन दोस्त घुटते हैं केवल इसीलिएइस ऊब घुटन से जाने कब सुर फूट पड़े।

रचनाकार: दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिएइस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिएआज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगीशर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिएहर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव मेंहाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिएसिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहींमेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिएमेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सहीहो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

रचनाकार: दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

रचनाकार: दुष्यंत कुमार

बतूता का जूता

इब्नबतूता पहन के जूतानिकल पड़े तूफान मेंथोड़ी हवा नाक में घुस गईघुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान कोमलते इब्नबतूताइसी बीच में निकल पड़ाउनके पैरों का जूता

उड़ते उड़ते जूता उनकाजा पहुँचा जापान मेंइब्नबतूता खड़े रह गयेमोची की दुकान में।

रचनाकार: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है...

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब पोथे खाली होते है, जब हर सवाली होते हैं,जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,जब सूरज का लश्कर चाहत से गलियों में देर से जाता है,जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते हैं,घबराते हैं,जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,वो पगली लड़की एक दिन मेरे लिए भूखी रहती है,चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,जो पगली लडकी कहती है, हाँ प्यार तुझी से करती हूँ,लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,ये कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी सार नहीं बाबा,बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है

रचनाकार: कुमार विश्वास

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है!

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है! मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है! ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!
मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है! कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !!
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं! जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता! यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !!
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले! जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !!
भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा! हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!!
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का! मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!

रचनाकार: कुमार विश्वास

होली की मस्ती में बॉलीवुड का सुरूर


रंग बरसे..(सिलसिला), होली के दिन..(शोले), होरी खेले रघुवीरा अवध में..(बागवां), आज न छोड़ेंगे बस हमजोली..(कटी पतंग) जैसे गीतों के बिना क्या आप होली की कल्पना कर सकते हैं।आपका जवाब न में ही होगा। होली का त्योहार आते ही मन में होली से जुड़े ये कुछ गीत दिमाग में आते हैं। इन गीतों का ध्यान आते ही मन में उमंग व ऊर्जा का संचार होता है। वैसे भी होली का त्योहार खुशियों व रंगों का त्योहार है।इस दिन न चाहते हुए भी आपके होंठों पर कुछ नगमे खुद ब खुद ही आ जाते हैं। और ये नगमे भारतीय हिन्दी फिल्मों में फिल्माए गए होली गीतों के होते हैं। होली की कल्पना इन गीतों के बिना करना बेमानी सी लगती है।इन गीतों को सुनकर मन में एक नई उमंग छा जाती है, पैर थिरकने लगते हैं व मन होली की मस्ती में डूब जाता है। वैसे ऊपर वर्णित गीतों के अलावा भी कुछ और गीत है जो भारतीय हिन्दी फिल्मों में फिल्माए गए हैं।देखो आई होली..(मंगल पांडे), अरे जा रहे हट नटखट(नवरंग), होली आई रे कन्हाई(मदर इंडिया), तन रंग लो जी आज, मन रंग लो..(कोहिनूर), अंग से अंग लगाना सजना(डर), मल दे गुलाल मोहे..(कामचोर), अपने रंग में रंग दे मुझको..(आखिर क्यों), आई रे आई रे होली..(जख्मी), फागुन आयो रे..(फागुन), ओ देखो होली आई..(मशाल), रंग दी प्रीत ने रंग दी..(धनवान) व कोई भीगा है रंग से..(मुंबई से आया मेरा दोस्त) जैसे कुछ और होली गीत हैं जो उतनी सफलता नहीं पा सके जितनी कि रंग बरसे.., होरी खेले रघुवीरा.. या होली के दिन.. जैसे गीतों ने सफलता पाई।लेकिन होली के ये गीत होली के दिन सुनने के लिए जरूर मिल जाते हैं। अगर आपको होली से जुड़े कुछ और गीत की जानकारी हो तो आपके द्वारा दी गई जानकारी को इस खबर में जोड़ा जाएगा।

विवादों में 'फंसी दे दना दन'


लगातार कई हिट फिल्मों में साथ काम करने वाली अक्षय कुमार व कैटरीना कैफ की जोड़ी एक बार फिर से नई फिल्म 'दे दना दन' में नजर आएगी। लेकिन यह फिल्म रिलीज होने के पहले ही विवादों के घेरे में आ गई है। विवादों में आने का कारण ये जोड़ी न होकर प्रीतम का संगीत है।
दरअसल फिल्म रिलीज होने के पहले ही इसका एक गाना काफी लोकप्रिय हो चुका है। हॉटी-नॉटी...बोल वाले गाने को भोजपुरी की सुपरस्टार सिंगर कल्पना ने गाया है। इसके साथ ही कल्पना का नाम भी इस विवाद में आ गया है।
यह गाना हरियाणा के प्रसिद्ध लोकगीत 'हट जा ताऊ पाछू डे' की ध्वनि पर ही बनाया गया है। अब चूंकि यह गाना चार्ट बस्टर में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करवा चुका है तब दिल्ली की एक संगीत कंपनी व हरियाणा के प्रसिद्ध लोकगीत हट जा ताऊ पाछू डे को गाने वाले सिंगर के कान खड़े हो गए हैं। संगीत कंपनी अपने गाने की धुन चुराने का आरोप लगाते हुए दिल्ली में कोर्ट केस करने की तैयारी में है।
कल्पना ने इसके पहले भी अक्षय कुमार व कैटरीना कैफ को फिल्म 'वेलकम' में ऊंचा लम्बा कद...गाने पर पर्दे पर थिरकाकर काफी तालियां बटोरी थीं। कल्पना ने इसके अलावा कई और हिंदी फिल्मों में भी गाना गाया है। उनमें 'बिल्लू बारबर' व रामगोपाल वर्मा की फिल्म 'रक्त चरित्र' भी शामिल है।
गाने की धुन को लेकर हुए विवाद पर अपनी ठसक भरी आवाज देने वाली भोजपुरी सिंगर ने मामले से अनभिज्ञता जताते हुए मुस्कुराकर केवल इतना कहना था कि गाना जोरदार बन पड़ा है।
कल्पना की मुस्कुराहट का राज क्या है, यह तो कल्पना को ही पता होगा। लेकिन प्रियदर्शन की यह कॉमेडी फिल्म नवंबर के अंतिम सप्ताह में दर्शकों के लिए देशभर के सिनेमाघरों में होगी।